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मान गए ज्यादातर बागी, जानिए मैदान में कितने बाकी

यमुनोत्री से संजय डोभाल, डोईवाला से जितेंद्र नेगी, लालकुआं से संध्या डालाकोटी, रुद्रप्रयाग से मातबर सिंह कंडारी और रुद्रपुर से राजकुमार ठुकराल निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतरे   

उत्तराखंड में भाजपा और कांग्रेस ज्यादातर बागी उम्मीदवारों को मनाने में कामयाब रही हैं। सोमवार को नाम वापसी के आखिरी दिन प्रदेश की 70 सीटों पर कुल 95 उम्मीदवारों ने नामांकन वापस लिया। अब कुल 632 उम्मीदवार मैदान में हैं। भाजपा और कांग्रेस में पिछले दो-तीन दिन से बागियों की मान-मनोव्वल का दौर चल रहा था, जिसमें काफी हद तक कामयाबी मिली है। लेकिन कई बागी उम्मीदवार मैदान में डटे हुए हैं। इनमें यमुनोत्री से संजय डोभाल, डोईवाला से जितेंद्र नेगी, लालकुआं से संध्या डालाकोटी, रुद्रप्रयाग से मातबर सिंह कंडारी और रुद्रपुर से राजकुमार ठुकराल प्रमुख हैं।   

कांग्रेस की तरफ से प्रदेश प्रभारी देवेंद्र यादव और संगठन के लोग बागी उम्मीदवारों से संपर्क कर उन्हें साधने में जुटे थे, जबकि भाजपा के लिए संकटमोचक की भूमिका राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी और पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने निभाई। कांग्रेस ने कई बागी उम्मीदवारों को पार्टी में पद देकर नाराजगी दूर करने का प्रयास किया है। लेकिन लालकुआं में पूर्व सीएम हरीश रावत को चुनौती दे रही कांग्रेस की बागी नेता संध्या डालाकोटी ने नाम वापस नहीं लिया। लालकुआं में कांग्रेस ने पहले संध्या डालाकोटी को टिकट दिया था लेकिन फिर उनका टिकट काटकर हरीश रावत को उम्मीदवार बनाया गया। पार्टी नेताओं ने संध्या डालाकोटी को मनाने के काफी प्रयास किए लेकिन उन्होंने मैदान नहीं छोड़ा है। रुद्रप्रयाग से कांग्रेस के बागी पूर्व मंत्री मातबर सिंह कंडारी ने भी नाम वापस नहीं लिया है। कांग्रेस की तरफ से उन्हें मनाने के ज्यादा प्रयास नहीं हुए।

ऋषिकेश में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर ताल ठोंंककर कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ाने वाले पूर्व कैबिनेट मंत्री शूरवीर सिंह सजवाण ने नाम वापस ले लिया है। कांग्रेस ने उनसे वार्ता का जिम्मा पार्टी के मुख्य चुनाव पर्यवेक्षक मोहन प्रकाश को सौंपा था। अपनी कोशिश में मोहन प्रकाश कामयाब रहे और सजवाण को कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बनाकर नाम वापसी के लिए मना लिया। शूरवीर सिंह सजवाण के नाम वापस लेने से ऋषिकेश में कांग्रेस को बड़ी राहत मिली है। बागियों को पार्टी में पद देकर मनाने की कांग्रेस की रणनीति कई जगह कारगर रही है। नरेंद्रनगर में भाजपा से आए ओम गोपाल रावत को टिकट मिलने से नाराज कांग्रेस नेता हिमांशु बिजल्वाण को प्रदेश महामंत्री बनाया गया है।

देहरादून की सहसपुर सीट पर कांग्रेस को बगावत का डर था। लेकिन सहसपुर से कांग्रेस के बागी प्रत्याशी मोहम्मद अनीस और आकिल अहमद ने नामांकन वापस ले लिया। इन दोनों को संगठन में पद मिले हैं। टिकट के दावेदारों और बागी उम्मीदवारों को मनाने में प्रदेश प्रभारी देवेंद्र यादव और पछवादून जिलाध्यक्ष संजय किशोर ने अहम भूमिका निभाई। नाम वापसी के आखिरी दिन सहसपुर में कांग्रेस के तमाम असंतुष्ट नेता पार्टी प्रत्याशी आर्येंद्र शर्मा के समर्थन में एक मंच पर नजर आए। जबकि पिछली बार आर्येंद्र शर्मा खुद ही बागी उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे थे। देहरादून की रायपुर सीट से कांग्रेस के सूरत सिंह नेगी, राजपुर रोड़ से संजय कनौजिया और देहरादून कैंट से चरणजीत कौशल ने भी नाम वापस लेकर पार्टी के प्रति वफादारी दिखाई है।

डोईवाला सीट पर निर्दलीय मैदान में उतरने वाले भाजपा नेता सौरभ थपलियान ने नाम वापस ले लिया है। सौरभ ने राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी से मुलाकात के बाद नाम वापस लेने का फैसला किया। डोईवाला सीट पर भाजपा के बागी जितेंद्र नेगी मैदान में डटे हुए हैं। नेगी भाजपा के जिलाध्यक्ष रह चुके हैं और पार्टी के उम्मीदवार को नुकसान पहुंचा सकते हैं। धनोल्टी से भाजपा के बागी महावीर सिंह रांगड ने भी नामांकन वापस नहीं लिया है। वे भी भाजपा को नुकसान पहुंचाएंगे।

रुद्रपुर से भाजपा के मौजूदा विधायक राजकुमार ठुकराल निर्दलीय चुनाव लड़ने के अपने फैसले पर अडिग हैं। टिकट कटने से नाराज ठुकराल भाजपा से इस्तीफा दे चुके हैं और केंद्रीय मंत्री अजय भट्ट के समझाने के बाद भी चुनाव से हटने को तैयार नहीं हुए। उधमसिंह नगर की किच्छा सीट पर भाजपा के बागी अजय तिवारी ताल ठोक रहे हैं। रामनगर से कांग्रेस के बागी संजय नेगी मैदान में हैं।

यमुनोत्री में भाजपा के बागी जगवीर सिंह भंडारी ने कांग्रेस प्रत्याशी दीपक बिजल्वाण के समर्थन अपना नामांकन वापस लिया। भंडारी भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। कोटद्वार में भाजपा के बागी नेता धीरेंद्र चौहान ने नाम वापस नहीं लिया जबकि कालाढूंगी सीट से भाजपा के बागी गजराज बिष्ट ने नाम वापस ले लिया है। इस तरह कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों से बगावत का बड़ा खतरा काफी हद तक टल गया है। बागी उम्मीदवारों की चुनौती अब कुछ ही सीटों पर बची है। लेकिन अब जो बागी मैदान में हैं उनमें कई दमखम वाले हैं।

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